Tuesday, December 21, 2021

Vikas Ke Sidhant विकास के सिद्धांत

 

Vikas Ke Sidhant

विकास के सिद्धांत

विकास से प्रमुख सिद्धांत निम्न प्रकार से है |

निरन्तरता का नियम  

यह नियम बताता है कि विकास एक न रुकने वाली प्रक्रिया है। माँ के गर्भ से ही यह प्रारम्भ हो जाती है तथा मृत्यु पर्यन्त निरन्तर चलती ही | रहती है। एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के कारण भली-भाँति सम्पन्न होता रहता है।

वृद्धि और विकास की गति की दर एक सी.नहीं रहती 

यद्यपि विकास बराबर होता रहता है, परन्तु इसकी गति सब अवस्थाओं में एक जैसी नहीं रहती। शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है।
पुनः किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है परन्तु यह अधिक समय तक नहीं बनी रहती।  पाती। 

वैयक्तिक अन्तर का नियम 

इस नियम के अनुसार बालकों का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है। वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी कारण उनमें पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। कोई भी एक बालक वृद्धि और विकास की दृष्टि से किसी अन्य बालक के समरूप नहीं होता।

विकास क्रम की एकरूपता 

विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन होते हैं। इस क्रम में एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की ओर से प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मकऔर भाषा विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान (Pattern) और क्रम के दर्शन किए जा सकते है।

सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं का नियम

विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके सामान्य रूप के दर्शन होते है। उदाहरण के लिए अपने हाथों से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर उधर यूँ ही हाथ मारने या फैलाने की चेष्टा करता है।

एकीकरण का नियम 

विकास की प्रक्रिया एकीकरण के नियम का पालन करती है। इसके अनुसार बालक अपने सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बदलते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा चेष्टाओं को इकठे रूप में प्रयोग में लाना सीखता है। को उदाहरण, फिर के उंगलियों लिए एक को बालक और फिर पहले, हाथ पूरे हाथ एवं उंगलियों को एक साथ चलाना सीखता है।

 भविष्यवाणी की जा सकती है 

एक बालक की अपनी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रख कर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी जा सकती है। उदाहरण के लिए एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया जाने वाला चित्र यह बता सकता है कि उसका आकार प्रकार आगे जा कर किस प्रकार का होगा। 

विकास की दिशा का नियम

इस नियम के अनुसार विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशामें आगे बढ़ती है। कुप्पूस्वामी ने इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि विकास Cephalocaudal और Proximo-Distal क्रम में होता है। 
(Cephalo-Caudal) क्रम का विकास लम्बवत रूप में (Longitudinal Direction) सिर से पैर की ओर होता है। सबसे पहले बालक अपने सिर और भुजाओं की गति पर नियंत्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टाँगों को। इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिना सहारे खड़ा होना और चलना सीखता है। 
(Proximo-Distal) क्रम के अनुसार विकास का क्रम केन्द्र से पारम्भ होता है, फिर बाहरी विकास होता है और इसके बाद सम्पूर्ण. विकास। उदाहरण के लिए, पहले रीड़ क हड्डी का विकास होता है और उसके बाद भुजाओं, हाथ तथा हाथ की उँगलियों का तथा तत्पश्चात् इन सबका पूर्ण रूप से संयुक्त विकास होता है।  

विकास लम्बवत् सीधा न हो कर वर्तुलाकार होता है  

बालक का विकास लम्बवत् सीधा (Linear) न हो कर वर्तुलाकार (Spiral) होता है।

विकास में परिवर्तन होता है 

मानव शिशुओं के विकास का पहला नियम यह है कि इसमें गुणात्मक परिवर्तन (Qualitative Changes). तथा परिमाणात्मक परिवर्तन (Qualitative Changes) दोनों होते है। जैसे-जैसे शिशुओं की उम्र बढ़ती जाती है उनके सीखने की क्षमता में परिवर्तन, सांवेगिक नियंत्रण में परिवर्तन, किसी विशेष भाषा को सीखने की क्षमता में परिवर्तन आदि होते है और ये सभी गुणात्मक परिवर्तन के उदाहरण है। गुणात्मक परिवर्तनों के अलावा बालकों में परिमाणातमक परिवर्तन, जैसे शरीर की बनावट में परिवर्तन, आकार में परिवर्तन, शरीर के भीतरी अंगो में परिवर्तन आदि भी होता है।

प्रारंभिक विकास परवर्ती विकास से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि बालको के प्रारंभिक विकास (Early Development) तुलनात्मक रूप से बाद के सालों में हुए विकास या परवर्ती विकास की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है

विकास परिपक्वता तथा सीखने की उपज है

जन्म के बाद बालको के सम्पूर्ण विकास में परिपक्वता तथा प्रशिक्षण दोनों की भूमिका प्रधान हो जाती है। सच्चाई यह है कि बालक में विकास सही अर्थ में परिपक्वता तथा प्रशिक्षण दोनों की अंत क्रिया पर निर्भर करता है।

विकास की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में सुख शांति एक समान नहीं होती है 

कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत Kohalberg Ka Naitik Vikas Sidhant

 

कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत Kohalberg Ka Naitik Vikas Sidhant

  • अमेरिकन मनोवैज्ञानिक कोहलबर्ग (1927-1987) ने ही 1958 में नैतिक विकास का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
  • इन्होंने नैतिकता के विकास को सिद्ध करने के लिए नैतिकता की 11 कहानियाँ ली थी।
  • कोहलबर्ग इन्हीं कहानियों को बच्चों को सुनाकर नैतिकता के स्तर को मापते थे।
  • इन कहानियों में से सबसे प्रसिद्ध हाइनज (हिंज/ Heinz) की कहानी प्रसिद्ध है। इन्होंने 20 वर्ष तक बच्चों के साथ साक्षात्कार कर (कहानी सुनाकर बच्चों से प्रश्न पूछना) निर्णय निकाला व यह नैतिक विकास का सिद्धांत दिया।
  • इस सिद्धांत में कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के सिद्धांत (Principle Of Moral Development) की कुल छः अवस्थाएँ बताई तथा इन अवस्थाओं को तीन स्तरों में बाँटा हैं

(1) प्री-कनवेशनल स्टेज/ पूर्व पारम्परिक/ पूर्व परम्परागत अवस्था (Pre Conventional Stage)- Kohalberg Ka Naitik Vikas Sidhant

👉 समय : शैशव अवस्था/ 4 से 10 वर्ष 
इस अवस्था में बालक में नैतिकता का अभाव होता है परन्तु बालक का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है तथा बालक अपने परिवार के वयस्क सदस्यों से नैतिकता की बातें सीखता है। वह जैसा देखता है वैसा ही सीखता है अर्थात् बाह्य घटना के आधार पर ही वह सही व गलत बताता है। बालक में तर्क एवं चिंतन का आधार बाहरी घटना होती है। इस स्तर की दो अवस्थाएँ है

(I) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Stage Of Order And Punishment)-

इस अवस्था में बालक आज्ञा इसलिए मानता है कि उसे दण्ड ना मिल जाए।

(Ii) अहंकार की अवस्था/ साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता (Stage Of Ego/ Instrumental Relativist Orientation) 

इस अवस्था में बालक में अहम् का भाव रहता है।

(2) कनवेशनल स्टेज/ पारम्परिक/ परम्परागत अवस्था (Conventional Stage) 

👉 समय :  बाल्य अवस्था/ 10 से 13 वर्ष
इस अवस्था में बालक का सर्वाधिक नैतिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक अपने समाज, धर्म, राष्ट्र एवं संस्कृति के आधार पर एवं इनके द्वारा बताये नैतिक मूल्यों के आधार पर नैतिकता का विकास करता है। इस अवस्था की भी दो अवस्थाएँ मानी है

(I) प्रशंसा की अवस्था/ उत्तम लड़का अच्छी लड़की अवस्था (Stage Of Appreciation/ Good Boy Nice Girl Orientation)-

इस अवस्था में बालक प्रशंसा पाना चाहता है।

(Ii) सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था (Stage Of Respect Towards Social System)-

बालक समाज द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं तथा नियमों के प्रति सम्मान रखता है।

(3) पोस्ट-कनवेशनल स्टेज/ उत्तर पारम्परिक अवस्था (Post Conventional Stage) 

👉 समय : किशोर अवस्था / 13 वर्ष के बाद
इस अवस्था में बालक का नैतिक विकास लगभग पूर्ण एवं बालक नैतिकता के लिए आत्मनिर्भर बन जाता है। इसके बाद बालक स्वयं नैतिक मूल्यों का निर्धारण करता है। इस अवस्था में भी दो अवस्थाएँ शामिल है

(I) सामाजिक समझौते की अवस्था (Stage Of Social Compromise)-

बालक को कई परिस्थितियों में समाज से समझौता करना पड़ता है।

(Ii) विवेक की अवस्था/ सार्वत्रिक नीति परक सिद्धांत उन्मुखता (Stage Of Conscience/ Universal Ethical Principle Orientation)-

इस अवस्था में अपने नैतिक नियमों को प्रोत्साहित करने एवं आत्मनिंदा से बचने का अभिप्रेरण अधिक होता है। यह अवस्था उच्चतम सामाजिक स्तर की उच्चतम अवस्था होती है। इस अवस्था के अंतर्गत किशोरों में सार्वत्रिक नैतिक नियम की नैतिकता विद्यमान रहती है।

Sunday, November 7, 2021

बुद्धि के सिद्धान्त

 

बुद्धि के सिद्धान्त

बुद्धि के स्वरूप एवं बुद्धि के सिद्धान्त (Theories of Intelligence) - दोनों ही बुद्धि के विषय के बारे में विचार प्रकट करते हैं परन्तु फिर भी दोनों में भिन्नता दृष्टिगत होती है। बुद्धि के सिद्धान्त उसकी संरचना को स्पष्ट करते हैं जबकि स्वरूप उसके कार्यों पर प्रकाश डालते हैं।


बिने का एक-कारक सिद्धान्त

एक-कारक सिद्धान्त (Uni-factor Theory) का प्रतिपादन फ्रांस के मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने (Alfred Binet) ने किया तथा अमेरिका के मनोवैज्ञानिक टर्मन तथा जर्मनी के मनोवैज्ञानिक एंबिगास ने इसका समर्थन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि वह शक्ति है जो समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है। इस सिद्धान्त के अनुयाइयों ने बुद्धि को समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करने वाली एक शक्ति के रूप में माना है। उन्होंने यह भी माना है कि बुद्धि समग्र रूप वाली होती है और व्यक्ति को एक विशेष कार्य करने में अग्रसित करती है। यह एक एकत्व का खंड है जिसका विभाजन नहीं किया जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि व्यक्ति किसी एक विशेष क्षेत्र में निपुण है तो वह अन्य क्षेत्रों में भी निपुण रहेगा। इसी एक कारकीय सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए बिने ने बुद्धि को व्याख्या-निर्णय की योग्यता माना है। टर्मन ने इसे विचार करने की योग्यता माना है तथा स्टर्न ने इसे नवीन परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता के रूप में माना है।

द्वितत्व सिद्धान्त[संपादित करें]

द्वितत्व सिद्धान्त (Bi-factor Theory) के प्रवर्तक ब्रिटेन के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्पीयर मेन हैं। उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों तथा अनुभवों के आधार पर बुद्धि के इस द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनके मतानुसार बुद्धि दो शक्तियों के रूप में है या बुद्धि की संरचना में दो कारक हैं। इनमें से एक को उन्होंने 'सामान्य बुद्धि' (General or G-factor) तथा दूसरे कारक को 'विशिष्ट बुद्धि' (Specific S- factor) कहा है। सामान्य कारक से उनका तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्तियों में कार्य करने की एक सामान्य योग्यता होती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति कुछ सीमा तक प्रत्येक कार्य कर सकता है। ये कार्य उसकी सामान्य बुद्धि के कारण ही होते हैं। सामान्य कारक व्यक्ति की सम्पूर्ण मानसिक एवं बौद्धिक क्रियाओं में पाया जाता है परन्तु यह विभिन्न मात्राओं में होता है। बुद्धि का यह सामान्य कारक जन्मजात होता है तथा व्यक्तियों को सफलता की ओर इंगित करता है।

व्यक्ति की विशेष क्रियाएं बुद्धि के एक विशेष कारक द्वारा होती है। यह कारक बुद्धि का विशिष्ट कारक (specific factor) कहलाता है। \ अतः भिन्न-भिन्न प्रकार की विशिष्ट क्रियाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट कारकों की आवश्यकता होती है। ये विशिष्ट कारक भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। इसी कारण वैयक्तिक भिन्नताएं पाई जाती हैं।

बुद्धि के सामान्य कारक जन्मजात होते हैं जबकि विशिष्ट कारक अधिकांशतः अर्जित होते हैं।

बुद्धि के इस दो-कारक सिद्धान्त के अनुसार सभी प्रकार की मानसिक क्रियाओं में बुद्धि के सामान्य कारक कार्य करते हैं जबकि विशिष्ट मानसिक क्रियाओं में विशिष्ट कारकों को स्वतंत्र रूप से काम में लिया जाता है। व्यक्ति के एक ही क्रिया में एक या कई विशिष्ट कारकों की आवश्यकता होती है। परन्तु प्रत्येक मानसिक क्रिया में उस क्रिया से संबंधित विशिष्ट कारक के साथ-साथ सामान्य कारक भी आवश्यक होते हैं। जैसे- सामान्य विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, दर्शन एवं शास्त्र अध्ययन जैसे विषयों को जानने और समझने के लिए सामान्य कारक महत्वपूर्ण समझे जाते हैं वहीं यांत्रिक, हस्तकला, कला, संगीत कला जैसे विशिष्ट विषयोंं को जानने ओर समझने के लिए विशिष्ट कारकों की प्रमुख रूप से आवश्यकता होती है। इससे स्पष्ट है कि किसी विशेष विषय या कला को सीखने के लिए दोनों कारकों का होना अत्यन्त अनिवार्य है।

त्रिकारक बुद्धि सिद्धान्त

स्पीयरमेन ने सन् 1904 में अपने पूर्व बुद्धि के द्विकारक सिद्धान्त में संशोधन करते हुए एक कारक और जोड़कर बुद्धि के त्रिकारक सिद्धान्त (Three factors theory of Intelligence) का प्रतिपादन किया। बुद्धि के जिस तीसरे कारक को उन्होंने अपने सिद्धान्त में जोड़ा उसे उन्होंने 'समूह कारक' (ग्रुप फेक्टर) कहा। अतः बुद्धि के इस सिद्धान्त में तीन कारक-

  1. सामान्य कारक
  2. विशिष्ट कारक
  3. समूह कारक

सम्मिलित किये गये हैं।

स्पीयरमेन के विचार में सामान्य तथा विशिष्ट कारकों के अतिरिक्त समूह कारक भी समस्त मानसिक क्रियाओं में साथ रहता है। कुछ विशेष योग्यताएं जैसे यांत्रिक योग्यता, आंकिक योग्यता, शाब्दिक योग्यता, संगीत योग्यता, स्मृति योग्यता, तार्किक योग्यता तथा बौद्धिक योग्यता आदि के संचालन में समूह कारक भी विशेष भूमिका निभाते हैं। समूह कारक स्वयं अपने आप में कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखता बल्कि विभिन्न विशिष्ट कारकों तथा सामान्य कारक के मिश्रण से यह अपना समूह बनाता है। इसीलिए इसे समूह कारक कहा गया है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस सिद्धान्त में किसी प्रकार की नवीनता नहीं है। थार्नडाइक जैसे मनोवैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा है कि समूह कारक कोई नवीन कारक नहीं है अपितु यह सामान्य एवं विशिष्ट कारकों का मिश्रण मात्र है।

थार्नडाइक का बहुकारक बुद्धि सिद्धान्त[

थार्नडाइक ने अपने सिद्धान्त में बुद्धि को विभिन्न कारकों का मिश्रण माना है। जिसमें कई योग्यताएं निहित होती हैं। उनके अनुसार किसी भी मानसिक कार्य के लिए, विभिन्न कारक एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। थार्नडाइक ने पूर्व सिद्धान्तों में प्रस्तुत 'सामान्य कारकों' की आलोचना की और अपने सिद्धान्त में सामान्य कारकों की जगह मूल कारकों (Primary factors) तथा सर्वनिष्ठ कारकों (कॉमन फैक्टर्स) का उल्लेख किया। मूल कारकों में मूल मानसिक योग्यताओं को सम्मिलित किया है। ये योग्यताएं जैसे- शाब्दिक योग्यता, आंकिक योग्यता, यांत्रिक योग्यता, स्मृति योग्यता, तार्किक योग्यता तथा भाषण देने की योग्यता आदि हैं। उनके अनुसार ये योग्यताएं व्यक्ति के समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है।

थार्नडाइक इस बात को भी मानते हैं कि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशिष्ट योग्यता अवश्य पायी जाती है। परन्तु उनका यह भी मानना है कि व्यक्ति की एक विषय की योग्यता से दूसरे विषय में योग्यता का अनुमान लगाना कठिन है। जैसे कि एक व्यक्ति यांत्रिक कला में प्रवीण है तो यह आवश्यक नहीं कि वह संगीत में भी निपुण होगा। उनके अनुसार जब दो मानसिक क्रियाओं के प्रतिपादन में यदि धनात्मक सहसंबंध पाया जाता है तो उसका अर्थ व्यक्ति में सर्वनिष्ट कारक भी हैं। ये उभयनिष्ठ कारक कितनी मात्रा में हैं यह सहसंबंध की मात्रा से ज्ञात हो सकता है।


थर्स्टन का समूह कारक बुद्धि सिद्धान्त

थर्स्टन (Thurston) के समूह कारक बुद्धि सिद्धान्त (Group factors Intelligence Theory) के अनुसार बुद्धि न तो सामान्य कारकों का प्रदर्शन है, न ही विभिन्न विशिष्ट कारकों का, अपितु इसमें कुछ ऐसी निश्चित मानसिक क्रियाएं होती हैं जो सामान्य रूप से मूल कारकों में सम्मिलित होती है। ये मानसिक क्रियाएं समूह का निर्माण करती हैं जो मनोवैज्ञानिक एवं क्रियात्मक एकता प्रदान करते हैं। थर्स्टन ने अपने सिद्धान्त को कारक विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किया। उनके अनुसार बुद्धि की संरचना कुछ मौलिक कारकों के समूह से होती है। दो या अधिक मूल कारक मिलकर एक समूह का निर्माण कर लेते हैं जो व्यक्ति के किसी क्षेत्र में उसकी बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं। इन मौलिक कारकों में उन्होंने आंकिक योग्यता, प्रत्यक्षीकरण की योग्यता (Perceptual ability), शाब्दिक योग्यता (Verbal ability), दैशिक योग्यता (Spatial ability), शब्द प्रवाह (Word fluency), तर्क शक्ति और स्मृति शक्ति (mental power) को मुख्य माना।

थर्स्टन ने यह स्पष्ट किया कि बुद्धि कई प्रकार की योग्यताओं का मिश्रण है जो विभिन्न समूहों में पाई जाती है। उनके अनुसार मानसिक योग्यताएं क्रियात्मक रूप से स्वतंत्र है फिर भी जब ये समूह में कार्य करती है तो उनमें परस्पर संबंध या समानता पाई जाती है। कुछ विशिष्ट योग्यताएं एक ही समूह की होती हैं और उनमें आपस में सह-संबंध पाया जाता है। जैसे विज्ञान विषयों के समूह में भौतिक, रसायन, गणित तथा जीव-विज्ञान भौतिकी एवं रसायन आदि। इसी प्रकार संगीत कला को प्रदर्शित करने के लिए तबला, हारमोनियम, सितार आदि बजाने में परस्पर सह-संबंध रहता है।

थॉमसन का प्रतिदर्श सिद्धान्त

थॉमसन (Thomson) ने बुद्धि के प्रतिदर्श सिद्धान्त (Sampling Theory of Intelligence) को प्रस्तुत किया। उनके मतानुसार व्यक्ति का प्रत्येक कार्य निश्चित योग्यताओं का प्रतिदर्श होता है। किसी भी विशेष कार्य को करने में व्यक्ति अपनी समस्त मानसिक योग्यताओं में से कुछ का प्रतिदर्श के रूप में चुनाव कर लेता है। इस सिद्धान्त में उन्होंने सामान्य कारकों (G-factors) की व्यावहारिकता को महत्व दिया है। थॉमसन के अनुसार व्यक्ति का बौद्धिक व्यवहार अनेक स्वतंत्र योग्यताओं पर निर्भर करता है परन्तु परीक्षा करते समय उनका प्रतिदर्श ही सामने आता है।

कैटल का बुद्धि सिद्धान्त

रेमण्ड वी. केटल (1971) ने दो प्रकार की सामान्य बुद्धि का वर्णन किया है। ये हैं फ्लूड (Fluid) तथा क्रिस्टलाईज्ड (Crystallized)। उनके अनुसार बुद्धि की फ्लूड सामान्य योग्यता वंशानुक्रम कारकों पर निर्भर करती है जबकि क्रिस्टलाईज्ड योग्यता अर्जित कारकों के रूप में होती है। फ्लूड सामान्य योग्यता मुख्य रूप से संस्कृति युक्त, गति-स्थितियों तथा नई स्थितियों के अनुकूलता वाले परीक्षणों में पाई जाती है। क्रिस्टलाईज्ड सामान्य योग्यता अर्जित सांस्कृतिक उपलब्धियों, कौशलताओं तथा नई स्थिति से सम्बंधित वाले परीक्षणों में एक कारक के रूप में मापी जाती है। फ्लूड सामान्य योग्यता (gf) को शरीर की वंशानुक्रम विभक्ता के रूप में लिया जा सकता है जो जैवरासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा संचालित होती है। जबकि क्रिस्टलाईज्ड सामान्य योग्यता (gc) सामाजिक अधिगम एवं पर्यावरण प्रभावों से संचालित होती है। केटल के अनुसार फ्लुड सामान्य बुद्धि वंशानुक्रम से सम्बिंधत है तथा जन्मजात होती है जबकि क्रिस्टलाईज्ड सामान्य बुद्धि अर्जित है।

बर्ट तथा वर्नन का पदानुक्रमित बुद्धि सिद्धान्त

बर्ट एवं वर्नन (Burt and Vernon's 1965) ने पदानुक्रमित बुद्धि सिद्धान्त (Hirarchical Theory of Intelligence) का प्रतिपादन किया। बुद्धि सिद्धान्तों के क्षेत्र में यह नवीन सिद्धान्त माना जाता है। इस सिद्धान्त में बर्ट एवं वर्नन ने मानसिक योग्यताओं को क्रमिक महत्व प्रदान किया है। उन्होंने मानसिक योग्यताओं को चार स्तरों पर विभिक्त किया-

  • (१) सामान्य मानसिक योग्यता
  • (2) मुख्य समूह कारक
  • (3) लघु समूह कारक
  • (4) विशिष्ट मानसिक योग्यता

सामान्य मानसिक योग्यताओं में भी योग्यताओं को उन्होंने स्तरों के आधार पर दो वर्गां में विभाजित किया। पहले वर्ग में उन्होंने क्रियात्मक (Practical), यांत्रिक (Machenical) एवं शारीरिक योग्यताओं को रखा है। इस मुख्य वर्ग को उन्होंने k.m. नाम दिया। योग्यताओं के दूसरे समूह में उन्होंने शाब्दिक (Verbal), आंकिक तथा शैक्षिक योग्यताओं को रखा है और इस समूह को उन्होंने v.ed. नाम दिया है। अंतिम स्तर पर उन्होंने विशिष्ट मानसिक योग्यताओं को रखा जिनका सम्बंध विभिन्न ज्ञानात्मक क्रियाओं से है।

इस सिद्धान्त की नवीनता एवं अपनी विशेष योग्यताओं के कारण कई मनोवैज्ञानिकों का ध्यान इसकी ओर आकर्षित हुआ है।

गिलफोर्ड का त्रि-आयाम बुद्धि सिद्धान्त

गिलफोर्ड (Guilford 1959, 1961, 1967) तथा उसके सहयोगियों ने तीन मानसिक योग्यताओं के आधार पर बुद्धि संरचना की व्याख्या प्रस्तुत की। गिलफोर्ड का यह बुद्धि संरचना सिद्धान्त त्रि-विमीय बौद्धिक मॉडल (Three Dimentional model) कहलाता है। उन्होंने बुद्धि कारकों को तीन श्रेणियों में बांटा है, अर्थात् मानसिक योग्यताओं को तीन विमाओं (डाइमेंशन्स) में बांटा है। ये हैं-

  • संक्रिया (Operation)
  • विषय-वस्तु (Contents)
  • उत्पाद (Products)

कारक विश्लेषण (Factor Analysis) से बुद्धि की ये तीनों विमाएं पर्याप्त रूप से भिन्न है। 5×4×6=120 तत्वों में वर्गीकृत किया गया है

बहुबुद्धि सिद्धान्त

इन सबके अलावा बुद्धि का एक सिद्धान्त है जिसे 'हॉवर्ड गार्डनर' ने प्रतिपादित किया, इसे बहुबुद्धि सिद्धान्त कहा जाता है। इसके अनुसार हर इंसान मे अलग प्रकार की बुद्धि होती है,जैसे कोई संगीत मे पारंगत हो सकता है तो कोई अभिनय मे तो कोई लेखन मे,कोई तार्किक क्षमता मे आदि। इन्होंने बुद्धि के इस सिद्धान्त को समझाने के लिए इसे नौ क्षेत्रों मे विभाजित किया है जो इस प्रकार हैं- 1-भाषागत

2-तार्किक-गणितीय

3-देशिक

4-संगीतात्मक

5-शारीरिक-गतिसंवेदी

6-अंतर्वैयक्तिक

7-अन्तः व्यक्ति

8-प्रकृतिवादी

9-अस्तित्ववादी

बुद्धि के प्रकार

 बुद्धि के प्रकार

  1. अमूर्त बुद्धि अमूर्त बुद्धि व्यक्ति की ऐसी बौद्धिक योग्यता जिसकी मदद से गणित, शाब्दिक, या सांकेतिक समस्याओं का समाधान किया जाता है। ...
  2. मूर्त या स्थूल बुद्धि मूर्त या स्थूल बुद्धि के द्वारा व्यक्ति विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का व्यावहारिक एवं उत्तम प्रयोग करने की क्षमता अर्जित करता है। ...
  3. सामाजिक बुद्धि

अधिगम अक्षमता का वर्गीकरण

 

अधिगम अक्षमता का वर्गीकरण

 

अधिगम अक्षमता एक वृहद् प्रकार के कई आधारों पर विभेदीकृत किया गया है।  ये सारे विभेदीकरण अपने उद्देश्यों के अनुकूल हैं।  इसका प्रमुख विभेदीकरण ब्रिटिश कोलंबिया (201) एवं ब्रिटेन के शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक सपोर्टिंग स्टूडेंट्स विद लर्निंग डिएबलिटी ए गाइड फॉर टीचर्स में दिया गया है, जो निम्नलिखित है -

  1. डिस्लेक्सिया (पढ़ने संबंधी विकार)
  2. डिस्ग्राफिया (लेखन संबंधी विकार)
  3. डिस्कैलकूलिया (गणितीय कौशल संबंधी विकार)
  4. डिस्फैसिया (वाक् क्षमता संबंधी विकार)
  5. डिस्प्रैक्सिया (लेखन एवं चित्रांकन संबंधी विकार)
  6. डिसऑर्थोग्राफ़िय (वर्तनी संबंधी विकार)
  7. ऑडीटरी प्रोसेसिंग डिसआर्डर (श्रवण संबंधी विकार)
  8. विजुअल परसेप्शन डिसआर्डर (दृश्य प्रत्यक्षण क्षमता संबंधी विकार)
  9. सेंसरी इंटीग्रेशन ऑर प्रोसेसिंग डिसआर्डर (इन्द्रिय समन्वयन क्षमता संबंधी विकार)
  10. ऑर्गेनाइजेशनल लर्निंग डिसआर्डर (संगठनात्मक पठन संबंधी विकार)

 

अधिगम अक्षमता एक वृहद् प्रकार के कई आधारों पर विभेदीकृत किया गया है।  ये सारे विभेदीकरण अपने उद्देश्यों के अनुकूल हैं।  इसका प्रमुख विभेदीकरण ब्रिटिश कोलंबिया (201) एवं ब्रिटेन के शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक सपोर्टिंग स्टूडेंट्स विद लर्निंग डिएबलिटी ए गाइड फॉर टीचर्स में दिया गया है, जो निम्नलिखित है -

  1. डिस्लेक्सिया (पढ़ने संबंधी विकार)
  2. डिस्ग्राफिया (लेखन संबंधी विकार)
  3. डिस्कैलकूलिया (गणितीय कौशल संबंधी विकार)
  4. डिस्फैसिया (वाक् क्षमता संबंधी विकार)
  5. डिस्प्रैक्सिया (लेखन एवं चित्रांकन संबंधी विकार)
  6. डिसऑर्थोग्राफ़िय (वर्तनी संबंधी विकार)
  7. ऑडीटरी प्रोसेसिंग डिसआर्डर (श्रवण संबंधी विकार)
  8. विजुअल परसेप्शन डिसआर्डर (दृश्य प्रत्यक्षण क्षमता संबंधी विकार)
  9. सेंसरी इंटीग्रेशन ऑर प्रोसेसिंग डिसआर्डर (इन्द्रिय समन्वयन क्षमता संबंधी विकार)
  10. ऑर्गेनाइजेशनल लर्निंग डिसआर्डर (संगठनात्मक पठन संबंधी विकार)

Tuesday, October 19, 2021

RRB NTPC CUTOFF आरआरबी एनटीपीसी 2021 परीक्षा

 आरआरबी एनटीपीसी 2021 परीक्षा न्यूनतम योग्यता अंक: आरआरबी अलग अलग डिफिकल्टी लेवल वाले पेपर में नॉर्मलाइज्ड मेथड का इस्तेमाल करेगा। फर्स्ट स्टेज सीबीटी के नॉर्मलाइज्ड स्कोर का उपयोग दूसरे स्टेज के सीबीटी के लिए उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के अनुसार शॉर्टलिस्ट करने के लिए किया जाएगा।

कैटेगरी वाइज क्वालीफाइंग मार्क्स की बात करें तो जनरल/EWS कैटेगरी में 40 फीसदी हो सकता है, OBC/SC कैटेगरी के लिए यह 30 फीसदी और एसटी कैटेगरी के लिए 25 फीसदी हो सकता है। वहीं PwBD कैंडिडेट्स को 2 फीसदी अलग से छूट दी जा सकती है। रेलवे भर्ती बोर्ड ने 28 दिसंबर 2020 से 31 जुलाई 2021 तक 7 फेज में फर्स्ट स्टेज कंप्यूटर आधारित टेस्ट आरआरबी एनटीपीसी 2021 परीक्षा आयोजित की। रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी) सीबीटी -1 के सभी 7 स्टेज के लिए अपनी क्षेत्रीय वेबसाइटों पर मेरिट सूची जारी करेगा।

Tuesday, September 28, 2021

स्किनर के क्रियाप्रसूत अनुकूलन (operant conditioning) या नैमित्तिक अनुकूलन (instrumental learning) सिद्धान्त #UPTET #CTET #SUPERTET

 स्किनर के क्रियाप्रसूत अनुकूलन (operant conditioning) या नैमित्तिक अनुकूलन (instrumental learning) सिद्धान्त के अनुसार, व्यवहार के परिणाम, क्रिया के होने की संभावना को प्रभावित करते हैं। एक व्यवहार जिसके पश्चात् एक सुखदायक उद्दीपक जुड़ा हुआ हो, उसके बार-बार होने की संभावना अधिक होती है, लेकिन यदि दूसरा व्यवहार किसी दंडात्मक उद्दीपक से जुड़ा हो तो उसके होने की संभावना कम हो जाती है। उदाहरण के लिए, एक बालक के किसी व्यवहार को अगर एक मुस्कराहट द्वारा प्रतिक्रिया दी जाए तो उस बालक द्वारा वह व्यवहार पुनः करने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन अगर ऐसे व्यवहार के लिए गुस्से की प्रतिक्रिया दी जाए तो उस व्यवहार के दुबारा प्रदर्शित करने की संभावना कम हो जाती है।

उन्होने 2 प्रकार की क्रियाओं पर प्रकाश डाला- क्रिया प्रसूत व उद्दीपन प्रसूत। जो क्रियाएं उद्दीपन के द्वारा होती है वे उद्दीपन आधारित होती है। क्रिया प्रसूत का सम्बन्ध किसी ज्ञात उद्दीपन से न होकर उत्तेजना से होता है।

स्किनर ने अपना प्रयोग चूहों पर किया। इसके लिए लीवर वाला वाक्स (स्किनर बाक्स) बनवाया। लीवर पर चूहे का पैर पड़ते ही खट की आवाज होती थी। इस ध्वनि को सुन चूहा आगे बढ़ता और उसे प्याले में भोजन मिलता । यह भोजन चूहे के लिए प्रबलन का कार्य करता। चूहा भूखा होने पर प्रणोदित होता और लीवर को दबाता। इन प्रयोगों में जब प्राणी स्वयं कोई वांछित व्यवहार करता है, तो व्यवहार के परिणाम स्वरूप उसे पुरस्कार प्राप्त होता है। अन्य व्यवहारों के करने पर उसे सफलता प्राप्त नही होती । वह पुरस्कृत व्यवहार आसानी से सीख लेता है।

निष्कर्ष यह है, कि यदि क्रिया के बाद कोई बल प्रदान करने वाला उद्दीपन मिलता है, तो उस क्रिया की शक्ति में वृद्धि होती है। स्किनर के मत में प्रत्येक पुनर्बलन अनुक्रिया को करने के लिए प्रेरित करता है।

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